Friday, September 10, 2021

सांवरिया सेठ मन्दिर

         राजस्थान का धनी मंदिर सांवरिया सेठ मन्दिर

         

चित्तौड़गढ़. 'मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरौ न कोई...'मीराबाई के इस प्रसिद्ध भजन में 'गिरधर गोपाल' राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के भादसोड़ा ग्राम में श्री सांवलिया सेठ के रूप में अवस्थित है. किंवदंतियों के अनुसार मीराबाई इन्हीं मुरलीधर की पूजा किया करती थी. तस्वीरों के माध्यम से जानिये मंदिर का पूरा इतिहास.

गुजरात के विश्वप्रसिद्ध अक्षरधाम मंदिर की तर्ज पर पिछले कई बरसों से श्री सांवलिया सेठ मंदिर का नव-निर्माण जारी है. इसमें मुख्य मंदिर के दोनों ओर बरामदों में दीवारों पर बेहद आकर्षक चित्रकारी की गई है. अक्षरधाम की तरह यहां भी मंदिर के बीच खाली मैदान में संगीतमय फव्वारा लगाया जाएगा. यहां विशेषकर उत्तर-पश्चिमी भारत के राज्य जैसे मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं. 1961 से ही इस प्रसिद्ध स्थान पर देवझूलनी एकादशी पर विशाल मेले का आयोजन हो रहा है। 


सांवलिया सेठ मंदिर की वास्तुकला प्राचीन हिंदू मंदिरों से प्रेरित है मंदिर की दीवारों और खम्भों पर सुंदर नक्काशी की गयी है जबकि, फर्श गुलाबी, शुद्ध सफेद और पीले रंग के बेदाग रंगों से बना है।

राजस्थान के सबसे धनी मंदिरों की बात की जाए तो सांवरिया सेठ मंदिर की गिनती उनमें शामिल होती है। दक्षिणी राजस्थान में श्रीनाथजी का मंदिर भी धनी मंदिर है लेकिन वहां सांवरिया सेठ की तरह हर माह दान में मिली राशि की गिनती नहीं होती। महज सांवरिया सेठ में हर माह की अमावस्या से पहले आने वाली चतुर्दशी की मध्यरात्रि को ही दानपात्र खोले जाते रहे हैं। आमतौर पर यहां हर माह तीन करोड़ रुपये से अधिक राशि दान में आती है। इसके अलावा भक्त सोना तथा चांदी के आभूषण तथा छत्र चढ़ाकर जाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि भगवान श्री सावलिया सेठ का संबंध मीरा बाई से है. किवदंतियों के अनुसार सांवलिया सेठ मीरा बाई के वही गिरधर गोपाल है, जिनकी वह पूजा किया करती थी. तत्कालीन समय में संत-महात्माओं की जमात में मीरा बाई इन मूर्तियों के साथ भ्रमणशील रहती थी. दयाराम नामक संत की ऐसी ही एक जमात थी जिनके पास ये मूर्तियां थी. बताया जाता है की जब औरंगजेब की सेना मंदिरों में तोड़-फोड़ कर रही थी तब मेवाड़ में पहुंचने पर मुगल सैनिकों को इन मूर्तियों के बारे में पता लगा. मुगलों के हाथ लगने से पहले ही संत दयाराम ने प्रभु-प्रेरणा से इन मूर्तियों को बागुंड-भादसौड़ा की छापर में एक वट-वृक्ष के नीचे गड्ढा खोदकर पधरा दिया. किवदंतियों के अनुसार कालान्तर में सन 1840 मे मंडफिया ग्राम निवासी भोलाराम गुर्जर नामक ग्वाले को सपना आया की भादसोड़ा-बागूंड गांव की सीमा के छापर में भगवान की तीन मूर्तिया जमीन मे दबी हुई हैं. जब उस जगह पर खुदाई की गयी तो सपना सही निकला और वहां से एक जैसी तीन मूर्तिया प्रकट हुईं. सभी मूर्तियां बहुत ही मनोहारी थी. देखते ही देखते ये खबर सब तरफ फैल गयी और आस-पास के लोग प्राकट्यस्थल पर एकत्रित होने लगे.


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